गुमराह थी मैं

अभी कुछ समय पहले की बात है कि पंतनगर विश्वविद्यालय में दो दिवसीय भव्य खेल-कूद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।पर मेरा मन खेल-कूद में नहीं लगता। चूंकि मैं उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र के एक छोटे से गांव की मूल निवासी हूं। उत्तराखंड का ज्यादातर भाग पहाड़ी क्षेत्र में आता है तो स्टेडियम का निर्माण भी आसान नहीं होता। और दूसरी तरफ गांव में रहने वाले लोग खेल-कूद के महत्व के बारे में इतने जागरूक नहीं होते।

          १५ फरवरी का दिन था। छात्रावास की सभी छात्राएं काफी उत्साहित थी दो दिवसीय खेलकूद प्रतियोगिता के लिए जो कि १६ और १७ फरवरी को आयोजित होने वाली थी।सभी बढ़ चढ़कर अपना नाम विभिन्न प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग हेतु सर्पोटस सेक्रेटरी को दे रहे थे। वहीं दूसरी ओर मैं हर्ष, उमंग और उत्साह से अपरिचित थी।उसी दिन रात में डिनर के बाद छात्रावास वार्डन ने सभी छात्राओं का १६ और १७ फरवरी को स्टेडियम में जाना जरूरी कह दिया।
        मैं भी ५२वी एथलीट मीट में दर्शक बनी।१६ फरवरी को जब मेरी आंख खुली तो चारों ओर शोर-शराबा था। विश्वविद्यालय वाइस चांसलर ने शुभारंभ के संकेत दिए।अब एथलीट मीट शुरू हुई और मैं भी कहीं दर्शकों की भीड़ में किसी कोने पर बैठी थी। आभासी तालियां बजाने का मन भी नहीं हो रहा था। विभिन्न प्रकार के खेल कूद प्रतियोगिताओं में छात्र छात्राएं स्वर्ण,रजत और कांस्य पदक जीतकर खुशी मना रहे थे। मेरे अंदर कोई उत्साह और हर्ष नहीं था। वहीं दूसरी ओर प्रतियोगिताओं में हारने वाले प्रतिभागी भी अगली बार मैदान में उतरने के उत्साह में थे।
     
        ४०० मीटर का दृष्टांत कुछ अचंभित करने वाला था।५वे स्थान पर आने वाली छात्रा पदक जीतने वाली छात्राओं से भी अधिक प्रसन्न लगी।बल्कि पूरे स्टेडियम में उसके जितना उत्साह किसी और में नजर नहीं आया। जिज्ञासु होकर मैं उस छात्रा के पास पहुंची और उससे पूछा -“आपने कोई पदक नहीं जीता और फिर भी आप निराशा के मुकाबले अधिक उत्साहित और खुश कैसे?"छात्रा ने उत्तर देते हुए कहा-“मैने प्रतियोगिता में जीतने के लिए प्रतिभाग नहीं किया था, पिछली बार इसी प्रतियोगिता में मुझे नौवां स्थान प्राप्त हुआ था,आज वह ४ स्थान की बढ़त ही मेरे लिए किसी पदक से कम नहीं है।"

         इस दृष्टांत ने तो मेरा नजरिया ही बदल दिया और यह मेरे जीवन की एक बहुत बड़ी सीख थी। मुझे महसूस हुआ कि मंजिल तो मिल ही जाती चाहे भटककर ही सही , गुमराह तो इसलिए रह गये क्योंकि घर का आंचल छोडा ही नहीं था।

     

       

     
         
     

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