पंतनगर की अप्रत्याशित यात्रा (भाग १)
मन तो नहीं था और न ही कभी सोचा था, पर खुदा-ए-मंजूर यही था तो हम भी आगए पंतनगर विश्वविद्यालय। पंतनगर में कृषि स्नातक में प्रवेश लिया पर रुचि तो थी नहीं,बस सब चलते जा रहा था कब, कैसे पता नहीं जिंदगी का वो पड़ाव था वो।हर समय मन में उलझन सी रहती थी क्या ये सही निर्णय होगा या ग़लत? इस तरह के कई सवाल आते थे मन में। थोड़ी खुशी थी, थोड़ा दुख भी था। खुशी इस बात की अब अपना मोबाइल फोन था और घर से थोड़ी कम बंदिशें थी। दुख इस बात का था कि अब प्यारा सा हमेशा साथ रहने वाला भाई और मम्मी पापा साथ नहीं थे हर वक़्त मुझे झेलने के लिए और प्यार करने के लिए और उन सपनों का जिन्हें बचपन से देखती थी, उन्हें भुला रही थी और दूसरे ही क्षेत्र में आगई थी। सच कहूं तो कुछ समय बाद दुख वाला हिस्सा खत्म सा होने लगा और कालेज के अनुभवों से अवगत होती गई। और बात रही सपनों को भुलाने वाली तो खुद पर इतना आत्मविश्वास तो था ही जिस भी क्षेत्र में जाऊं कुछ अच्छा ही करूंगी । और अंदर से बचपन से हमेशा सुनने वाली यह पंक्ति ‘जो होता है अ...