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पंतनगर की अप्रत्याशित यात्रा (भाग १)

     मन तो नहीं था और न ही कभी सोचा था, पर खुदा-ए-मंजूर यही था तो हम भी आगए पंतनगर विश्वविद्यालय। पंतनगर में कृषि स्नातक में प्रवेश लिया पर रुचि तो थी नहीं,बस सब चलते जा रहा था कब, कैसे पता नहीं जिंदगी का वो पड़ाव था वो।हर समय मन में उलझन सी रहती थी क्या ये सही निर्णय होगा या ग़लत? इस तरह के कई सवाल आते थे मन में।        थोड़ी खुशी थी, थोड़ा दुख भी था। खुशी इस बात की  अब अपना मोबाइल फोन था और घर से थोड़ी कम बंदिशें थी।       दुख इस बात का था कि अब प्यारा सा हमेशा साथ रहने वाला भाई और मम्मी पापा साथ नहीं थे हर वक़्त मुझे झेलने के लिए और प्यार करने के लिए और उन सपनों का जिन्हें बचपन से देखती थी, उन्हें भुला रही थी और दूसरे ही क्षेत्र में आगई थी।       सच कहूं तो कुछ समय बाद दुख वाला हिस्सा खत्म सा होने लगा और कालेज के अनुभवों से अवगत होती गई। और बात रही सपनों को भुलाने वाली तो खुद पर इतना आत्मविश्वास तो था ही जिस भी क्षेत्र में जाऊं कुछ अच्छा ही करूंगी । और अंदर से बचपन से हमेशा सुनने वाली यह पंक्ति ‘जो होता है अ...

मां तू क्यों कभी थकती नहीं?

मां तू क्यों कभी थकती नहीं? दिन भर काम करने के बाद भी मां कैसे फिर भी तू मुस्कुराती और सारा माहौल उर्जा से भर देती मां तू क्यों कभी थकती नहीं? हंसते-हंसते त्याग करते हुए कभी बच्चों के लिए,कभी पति के लिए, कभी मायके के लिए, कभी ससुराल के लिए तू एक उजाला है अंधेरे में जब कभी हो जाते हैं मायूस तो झुलसते दिलों में कोयल सी बोली है तू मां मां तू क्यों कभी थकती ‌नहीं? सबकी चिंता करते हुए पूरे परिवार के आंसू अपनी आंखों में समा लेने में हमारी खुशियों में शामिल होकर अपने ग़म भुलाने में मां तू क्यों कभी थकती नहीं? हमारे डगमगाते क़दमों को सम्हालने में हमें सहारा देने में हमारे लिए लड़ते हुए मां तू क्यों कभी थकती नहीं? हमें उठाते, बढ़ाते हमारी सराहना करते हुए हमें कोहिनूर समझते हुए हमारी परवरिश करते हुए मां तू क्यों कभी थकती नहीं?

गुमराह थी मैं

अभी कुछ समय पहले की बात है कि पंतनगर विश्वविद्यालय में दो दिवसीय भव्य खेल-कूद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।पर मेरा मन खेल-कूद में नहीं लगता। चूंकि मैं उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र के एक छोटे से गांव की मूल निवासी हूं। उत्तराखंड का ज्यादातर भाग पहाड़ी क्षेत्र में आता है तो स्टेडियम का निर्माण भी आसान नहीं होता। और दूसरी तरफ गांव में रहने वाले लोग खेल-कूद के महत्व के बारे में इतने जागरूक नहीं होते।           १५ फरवरी का दिन था। छात्रावास की सभी छात्राएं काफी उत्साहित थी दो दिवसीय खेलकूद प्रतियोगिता के लिए जो कि १६ और १७ फरवरी को आयोजित होने वाली थी।सभी बढ़ चढ़कर अपना नाम विभिन्न प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग हेतु सर्पोटस सेक्रेटरी को दे रहे थे। वहीं दूसरी ओर मैं हर्ष, उमंग और उत्साह से अपरिचित थी।उसी दिन रात में डिनर के बाद छात्रावास वार्डन ने सभी छात्राओं का १६ और १७ फरवरी को स्टेडियम में जाना जरूरी कह दिया।         मैं भी ५२वी एथलीट मीट में दर्शक बनी।१६ फरवरी को जब मेरी आंख खुली तो चारों ओर शोर-शराबा था। विश्वविद्यालय वाइस चांसलर ने शुभारंभ ...

पर मैं खुश हूं

                           पर मैं खुश हूं लोग मुझे बच्चा कहते हैं पर मैं खुश हूं लोग मुझे अपरिपक्व कहते हैं पर मैं खुश हूं आसान है क्या बच्चा होना? अपना मन साफ रखना वर्तमान में जीना कहीं भी, कभी भी खुल के रोना खुल के हंसना बिना किसी घमंड और परिपक्वता के नाटक  से दूर रहना। आसान है क्या बच्चा होना?? हर किसी के साथ घुल-मिल जाना कोई अपना नहीं, कोई पराय नहीं सबको बराबर प्यार देना महीनों तक जब परिवार वालों से न मिलों कोई त्योहार न मनाओ तब भी अपने चेहरे पर १०० वा़ट वाली मुस्कराहट से दोस्तों, वरिष्ठों, शिक्षकों में ही अपना परिवार ढूंढना आसान है क्या बच्चा होना? निस्वार्थ भाव से किसी से जुड़ना लोगों से अपनी बात बिना किसी संकोच से व्यक्त करना आसान है क्या बच्चा होना! सपने देखना उनमें जीना  सबसे अपने सपनों की बातें करना बिना किसी परवाह के बस उनमें चलते जाना आसान है क्या बच्चा होना? निराश होकर अगले ही पल भूल जाना फिर दुनिया में अच्छाई की तलाश करना आसान है क्या बच्चा होना? जान से प...